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भाग्य और कर्म

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आज का संतसग शुरू करने से पहले आईये रोज की तरह हम दो मिनिट का भगवन नाम का संर्कीतन करें। बड़े भाव से बड़े प्रेम से सब मेरे साथ गाईये।

                         
                             “हमारो धन राधा श्री राधा परम धन राधा राधा राधा राधा ....”

 श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन है ।
आज का हमारा सतसंग का विषय है “भाग्य और कर्म” इस संसार में हम देखते है कि कुछ लोग कर्मवादी होते है । वो कर्म पर यकीन रखते है । और कुछ किस्मत पर, कि भाग्य में जो लिखा होगा वहीं हमे मिलेगा. इस तरह से दोनों तरह के लो्ग है अगर हम गहराई में जाकर देखें तो दोंनों केाई संबंध है तभी ये आपस में जुडे है । व्यापारी लोग अपने खाते बनाते है । कुछ ना कुछ लिखते है ओर साल के अंत में उसको बंद कर देते है । और फिर नए साल में नया शुरू कर देते है ।तब पुराना बंद करते है तो नए में सब गुणा भाग करके नए में  चढाते है फिर पुराने को बंद कर देता है . 



ऐसे जीवन है । हर वयक्ति बिना कर्म के नहीं रह सकता वो शांत भी बेठा है । तो उसका मन कहीं ना कहीं लगा है । कर्म ही कर रहा है ।ऐसा तो हो ही नहीं सकता की कुछ उसमें हिसाब किताब ना बनें तो कर्म का हिसाब किताब बनता है । तो व्यक्ति के कर्म के हिसाब से किताब बनता है ।कर्म के फल को ही भाग्य कहा जाता है । व्यक्ति जो भी कर्म करता है । कर्म ही भाग्य है । इंसान के भाग्य का तय होना कर्म पर निर्भर करता है ।



प्रसंग १- एक बार एक ब्राहमण थे वो भाग्यवादी थे, तो वो गरीब थे कुछ मेहनत नहीं करते थे,कि जो भाग्य में होगा वही मिल जायेगा . उसका एक बेटा था वो इसमें उलझा रहता था कि क्या भाग्य ही सबकुछ है । एक दिन वह मंदिर गया. तो उसने एक पुजारी से पूछा कि भाग्य और कर्म का क्या रिष्ता है । आप बताओ ?



तो उसके पिता भी साथ में थे । तो पुजारी उसके पिता से कहते है । कि आपके पुत्र का भाग्य तो बहुत अच्छा है । पर एक ग्रह गडबड कर रहा है । यदि वह ग्रह ठीक हो जाये तो सब ठीक हो जायेगा. तो ब्राह्मण ने कहा - कि क्या काम करना है ?



तो वो पुजारी कहते है -   इस गाँव में एक कुआँ खोद दो उससे गाँव वालों को पानी मिल जाएगा,और आपसे निकी का काम भी हो जायेगा. तो वो दोंनो बाप बेटा कुआँ खोदने लगे. और कुछ दिनों बाद उसमें पानी आ गया और एक घडा निकल आया तो वो पुजारी जी के पास लेकर गए. तो उसमें सोने की मुहरें थी और वो खुष हुए और घडा दे दिया.



तो पुजारी जी कहते है - कि आप को समझ में आया? वे कहते है कि हमें तो कुछ भी समझ में नहीं आया.पुजारी कहते है कि कि भाग्य का दूसरा नाम ही कर्म है । आपने कर्म किया तो आपका भाग्य बना व्यक्ति कर्म नहीं करेगा भाग्य कैसे बनेगा वो् तो हम जैसे कर्म करते है । वहीं हमारा भाग्य बन जाता है । भाग्य तो हर एक प्र्राणी के साथ जुडा है । हर इंसान हर जानवर के साथ जुड़ा है.



प्रसंग २-
हम देखते है । कि केाई कुत्ता आवारा है । सड़क पर मारा मारा फिरता है और कोई गाडी में घुम रहा है और वह वैसा खाना खाता है जो सायद एक इंसान को भी ना मिले .तो हमें उस समय दया आती है । पर भगवान ने कुछ नियम बनाए है । कुछ काम व्यक्ति के आगें के समय केा निर्धरित कर देते है । कि आगे ये होने वाला है । व्यक्ति के काम ही निर्धारित करते है ।



प्रसंग ३- हम अगर पिक्चर देखने जाते है । और कुछ लेट हो जाते है । तो हम देखते है । कि एक व्यक्ति भाग रहा है । और उसका सब लोग मारे रहे है  पर हमें दया आ जाती है । कि लोग इतना इसे क्यों मर रहे है .क्योंकि हमें कारण का पता नहीं और यदि हम पिक्चर को हम शुरू से देखते है तो हमें पता चलता कि ये वयक्ति खून करके भाग रहा है । तो वो दया हमारी गायब हो जाती है ।तो हमनें अपने इस जन्म का ही देखा है कि हमनें कितने अच्छे कर्म और बुरे कर्म पिछले जन्म में किए है हमने अपने इस जन्म का ही देखा है.प्रेम से कहिए श्री राधे


हर व्यक्ति अपना भाग्य खुद ही लिखता है  हम जो आज है । वो कल का परिणाम है । और आज करेंगे वो कल बनेगा. दोनों हमारे हाथ में है . और रही अगर संबंधो की बात तो ये भी पिछले जन्म के कर्मों की बात है ।



प्रसंग ४- भागवत में एक प्रसंग है । एक राजा थे उनका विवाह हो गया था पर उनके कोई संतान नहीं थी वो बडै दुखी थे कि मेरे बाद ये राज्य कौन चलाएगा अब बडी प्रार्थनाओं के बाद राजा की बडी रानी के यहाँ बेटा हुआ तो बाँकि सब रानियाँ उससे जलती थी कि यहीं राजकुमार बनेगा और इसकी माँ राजमाता तो उन सबने एक दिन उसको सबने खाने मे विष मिलाकर खिला दिया. और वो मर गया.



तो राजा रानी बहुत दुखी हुए कि जब उसे चिता पर लेटाया गया तो और वो तो उसके साथ मरने लगे. तो नारद जी वहाँ आ गए और बोले कि आप इतने दुखी क्यों हो ?



वो बोले -  कि मेरा एक बेटा था वो मर गया तो नारद जी बोले वो तो आपके इस जन्म बेटा मानते है इसलिए इतने दुखी हो. पर वो नहीं माने. तो नारद जी कहते है । कि मै् इस बेटे की जीवात्मा को बुलाता हूँ । उससे पूछताँ कि तुम्हारे माता पिता तुमसे इतना प्यार करते है । तुम क्यों चले गए ?



तो वो जीवात्मा आकर बोलती है । जब नारद जी उससे पूछते है.



तो वह जीवात्मा कहता है - कि कौन से माता पिता ?मेरे तो कई जन्म हुए ओर कई लोगों का बेटा बना, कई जन्मो में पिता बना . इनसे सबंध कि बात आप करते हो. तो सुनिये मै पिछले जन्म में भिखारी था तो मै भिक्षा माँगने गया और एक घर से एक औरत ने मुझे लकडियाँ दी तो वो गीली थी और मेने जब आग जलाई तो मै देख नहीं पाया कि उसमें चीटियाँ है। और जला दिया तो वो सब चीटियाँ मर गई. समय रहते मेरी मृत्यु हो गई. और उसके बाद जिसने मुझे भिक्षा दी. और अगले जन्म मै उसका पु़त्र बना और ये रानियाँ वो चीटियाँ है । इन्हेंने विष दी.क्योकि मैंने इन्हें आग में जलाया था तो इन्होने मुझे बिष दिया . क्योंकि आग से जलाने और विष में दोनों में एक सी जलन होती है ।



तो ये कर्म  है और जब कर्म खत्म हुआ तो मेरी मृत्यु हो गई तो कर्म खत्म होते ही हिसाब खत्म हो गया और सब अपने रस्ते आ गए किसी की गलती नहीं है । पर कर्म तो हमें भोगना ही था. चुकी ये भागी दार थी इसलिए इन्हें भी भोगना पड़ा.



कहने का तात्पर्य है । कि संबंध हमारे कर्मों से ही बनते है । विधाता किसी का भाग्य नहीं बनाता .कुछ इरादा परमात्मा का भी होता है । उसने संसार बनाया है । इसमें हर कार्य का प्रभाव और परिणाम है । जैसे यदि कोई व्यक्ति हवाई जहाज का टिकिट केाई लेगा और जाएगा एक से दूसरी जगह जायेगा वह इसमें स्वतंत्र है , उसमें पर अगर कोई अधिकारी उसे रोक दे कि जहाज में खराबी है । तो यहाँ वो विवश  हो जाएगा पहले नहीं था,कही वह विवश हो जाता है.



हर व्यक्ति जिससे पिछले जन्म में किसी से कोई संबंध थे वो खत्म हो जाते है । इस जन्म में सामने होने पर भी कोई रिश्ता नहीं होता. पर आसक्तिी बनी रहती है । इसी से कहते है तो व्यक्ति को निष्काम कर्म करना है । मतलब कर्म करें उसमें मोह ना रखे कर्म को परमात्मा को अर्पण करे ऐसा करने से कर्म के मोह से मुक्त हो जाएगा . वरना वो मोह उसका अगले जन्म में पीछा नहीं छोडेगा.



प्रसंग ५ - एक बार एक सेठ की अनाज की दूकान थी बहुत पैसे वाला था. एक दिन एक आदमी बहुत से बकरे लेकर जा रहा था उसमे से एक बकरा उस दूकान कि तरफ चला गया.और अनाज की ढेरी पर मुहॅ मारा. तो उस सेठ ने उसके मुहॅ पर लोहे की राड मारी. ओर वो वहा से भाग गया. तो उपर नारद जी ये देखकर हसॅने लगे उनके साथ एक ऋषि थे उन्होंने कारण पूछा तो नारद जी कहने लगे - कि ये जो बकरा है ये पिछले जन्म में इस दुकान का मालिक था.और आज जो दूकान का मालिक है वह इसका बेटा है. ये पिछले जन्म में ये गरीब था परमात्मा कि कृपा से व्यापार चलाऔर बहुत पैसा हो गया. जब पैसा आया तो अहंकारी हो गया.सदा मै मै मेरा पैसा मेरी दूकानइस प्रकार करता जब मृत्यु हुई तो भगवान ने बकरा बनाया तू मै मै करता था  अब खूब मै मै कर.इतने सारे बकरों मै से यही दूकान कि ओर आया क्योकि पूर्व जन्म कि आसक्ति थी.ओर उसे उसी के बेटे ने छड़ी मार कर दी.



प्रसंग ६-
एक बार एक मंदिर में दो लोग जाते थे एक चोर था और एक सज्जन तो चोर हमेषा भगवान को गलत बोलता और दूसरा भगवान की सेवा करता तो यो रोज का नियम था एक दिन चारे मंदिर से  जाने लगा तो उसके सोने की मुहर मिली और सज्जन के पैर में कील चुभ गई.


तो वो भगवान से बोला - प्रभु आपने ऐसा क्यों किया ?



तो भगवान ने कहा -  कि इस चोर को आज राजा बनना लिखा था . पर इसके गलत कर्म के कारण इसके एक मुहर ही मिली और तुम्हें पिछले जन्म के हिसाब से आज मरना था तो तुम्हें ये कील लगी व्यक्ति के साथ जो भी होता है । वो उसके कर्मों का फल होता है ।  तो हम जैसे कर्म करेंगे वैसा ही हमारा भाग्य बनेगा और उसी का परिणाम हमें मिलेगा. 

                                                       
                                                         “राधे-राधे”

 

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