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सीख

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलों के लिए हम बड़े प्रेम बड़े भाव से भगवन नाम का संकीर्तन करे,सब मेरे साथ गाइए .....

 

राधे गोविंद भजो, राधे-गोविंदा, श्री राधे-गोविंद भजो, राधे गोविंदा ......

 

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

 

आज का हमारा संतसग का विषय है “सीख” तो सीख क्या है ?सभी जानते है कि हम इस दुनिया में जो भी पाते है जो अच्छी चीजें अपने अंदर लाते है वो ही सीख है .व्यक्ति अपने जीवन में दो प्रकार से सीखता है एक तो अपने माता पिता से गुरू से, स्वयं के अनुभवों से, और देांनों ही प्रकार की सीख महत्वपूर्ण है.

 

हम देखते है कि बच्चा जब चलना सीखता है तो वो गिरता है और खुद ही फिर उठकर चलता है तो हर बार गिरने से वो सीखता है और अनुभव लाता है अपने अंदर कहने का अभिप्राय हम जीवन में जो कुछ भी गलतियों करते है हम अपनी गलतियों से भी सीखते और दूसरों से भी सीखते है । कहने का तात्पर्य ये है कि जीवन में हर पल हर घड़ी हम नया सीखते है कहते है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती व्यक्ति सारी उम्र कुछ ना कुछ सीखता रहता है । प्रेम से कहिए श्री राधे और गलती वाली सीख तो बडे काम की होती है ।

 

प्रसंग १-  तुलसीदास जी के जीवन का एक प्रसंग है जब वो बडे हुए तो उनकी शादी हुई तो उनकी पत्निी बडी सुंदर थी और स्वभाव की बहुत अच्छी थी. विवाह के बाद तुलसीदास को पत्निी से बहुत मोह हो गया इतनी आसक्तिी हुई कि वो उनके बिना कुछ भी नहीं करते थे हमेषा उनको सामने रखते थे । ऐसा करते करते पाच वर्ष बीत गए. और पत्निी से लगाव बढता गया और

 

एक दिन तुलसी दास जी कहीं बाहर गए सामान लेने तो उस बीच उनकी पत्निी के भाई उनसे मिलने आए और ले गए साथ में, तो जब तुलसीदास जी लौट के आए तो देखा कि पत्निी तो जा चुकी है तो वो बहुत व्याकुल हुए उस रात को तो मिलने के लिए घर से निकले देखा कि नदी में बाढ आई है मन में पत्नी से मिलने ही व्याकुलता थी पानी गिर रहा है । तो वो एक बहते हुए मुर्दे के सहारे नदी पार करके अपनी पत्निी के गाँव पहुँच गए. क्योंकि वो पत्निी के मोह में अंधे थे आगे बढे तो देखा कि दरवाजा केाई खोल ही रहा, घर का, तो दीवाल पर एक सांप को रस्सी समझकर अपनी पत्निी के कमरे में पहुँच गए.

 

और पत्नी को जगाया और जब पत्निी देखा तो वो चैंक गई कि ये सांप को रस्सी समझकर आ गए तो वो बोली - कि आप इस हाड मास के शरीर में इतना मरते है ,जो नष्ट होना है अगर इतनी मेहनत आपने परमात्मा के लिए की होती तो वो आज आपको मिल गया होता है. धिक्कार है आपके उपर. तुलसीदास जी को ये बात लगी और वो वहाँ से चले गए और सोचने लगे कि मेरी पत्निी ठीक कह रही है । ये मेरी आसक्तिी है और वो वहाँ से चले गए वैरागी बन गए और फिर राम के उन्हें दर्षन हुए और रामचरित्र मानस उन्होंने लिखी ये एक सीख का ही प्रभाव है ।

 

व्यक्ति अपनी गलतियों से ही सीखता है । ये हमारे उपर है कि हम किससे औेर कितना सीख रहे है । क्योंकि ये जीवन है इसमें कई संभावनाएँ है हम परिस्थितयों के हिसाब से बदल जाते है । और कभी कभी भी केाई नई परिस्थिती आई है तो उसके हिसाब से ढलना ही है । उसके बाद फिर नई, तो हमारे अस्तित्व का क्या प्रयोजन है  यहीं कि हम संभावनाओं को चरितार्थ करें । हमनें उससे क्या सीखा  उससे ही हमारे चरित्र का निर्माण होता है अवसर व्यक्ति को जीवन में बहुत मिलते है । पर हम उस अवसर से क्या और कैसे सीखते है ।  और सीखनें में ना केाई उम्र होती है एक षिष्य अपे गुरू को भी  सिखा सकता है इसमें केाई पांबदी नहीं होती.

 

प्रसंग २-  एक आश्रम था उसमें एक गुरू थे उनके बहुत सारे शिष्य थे तो जब अध्ययन खत्म होने वाला था । तो वो बोले - कि तुम लोग अब अध्ययन करने के लिए बाहर जाओ. तो ही शिक्षा पूरी होगी तो सारे शिष्य बाहर गए और बाद में लौट के आ गए तो एक शिष्य वापिस नहीं आया. तो गुरूदेव ने पूछा कि वो क्यों नहीं आया तो वो बोले - कि हमें तो कुछ मालूम नहीं वो कहाँ गया.

 

तो कुछ दिन बाद वो भी आ गया तो वो बोले कि बेटा तुमने क्या सीखा ता वो बोला कि गुरूजी मैने कुछ नहीं सीखा और जो सीखा था तो वो भी भूल गया फिर एक दिन वो शिष्य गुरूदेव के पैर दबा रहा था और बोला-  कि मंदिर बहुत अच्छा है पर मुर्ति नहीं है.

 

तो गुरूदेव को बुहत गुस्सा आया और उसको बाहर निकाल दिया तो वो शिष्य बाहर कुटिया बना के रहने लगा एक दिन गुरू सारे शिष्यों पढा रहे थे तो एक मधुमक्खीकमरे में आ गई वहाँ से जाने लगी तो वो शिष्य बोला कि तू कहाँ जा रही है, वहाँ कोई दरवाजा नहीं है । वहाँ तो दीवार है. तेरा द्वार वहीं है जहाँ से तुम आई हो,

 

तो गुरू जी ने सोचा-  कि ये क्या बोल रहा है फिर उन्हेंने सोचा कि ये पूरी मानव जाति के लिए बोल रहा है कि भटक कर तुम कहाँ जाओगे । तुम्हारा जाने का द्वार वहीं है जहाँ से तुम आये हो वो परमात्मा जहाँ से तुम आए हो वहीं जाओगे.  और गुरू ने गौर से उस शिष्य की आंखो में देखा तो उनको लगा कि ये वो नहीं है केाई और ही है । वास्तव में वो शिष्य कुछ जानकर कर आया था. सीखकर नहीं आया है.सीखने में और जानने में एक अन्तर होता है . सीख वो जो हम दूसरों से खुद के अनुभवों से लेते है । पर जानना एक बहुत बडी चीज है सीख से उपर है.

 

व्यक्ति जब अपने अंदर उतकर अपनी आत्मा को जानता है । वहीं सबसे बडी सीख है हम खुद से कभी नहीं सीखते परमात्मा हमसब के अंदर है । हमें उसको दुनिया में खोजने नहीं जाना है हमसे छोटा भी  हमें सिखा सकते है ।

 

गुरू हमें कभी नहीं सिखाता हम सबको अपने आप में ही सीखना है केाई भी चीज जब हम सीखते है । तो हमें सामने वाला संकेत करता है कि ये ऐसा करना है बाँकि चीज तो हमें ही करना है । कहीं केाई घटना हमारे जीवन में घटती है चाहे वो बुरी हो पर हमे बहुत कुछ सीखा के जाती है । हर गलती हमें नया मौका देती है कि इससे और सीख लो और सुधार लो तो हम स्वंय से जितना सीखते है और कहीं से नहीं सीख सकते है ।

 

प्रसंग ३-  शुकदेव जी जो वेदव्यास जी के पुत्र है उन्हेंने राजा परीक्षित को भागवत सुनाई अवदूत थे वो एक बार जब वेदव्यास जी ने उनकी शिक्षा पूरी की तो वो बोले कि अंतिम पाठ के लिए तुम्हें जनक पुरी में जाना होगा. तो वो जाकर जनक पुरी के द्वार पर जाकर खड़े हो गए. तो किसी ने उनसे कुछ भी नहीं पूछाँ कि आप कौन हो? कहाँ से आए हो?

 

तो शुकदेव जी मन में बहुत शांत और तीन दिन तक वो ऐसे ही खडे रहे पर किसी ने नहीं कहा - कि आप क्यों आए. तीन दिन बाद एक द्वारपाल ने उनसे कहा - आप अंदर चलिए तो शुकदेव जी ने देखा कि महल सारी सुख सुविधाओं से भरा पडा है जनक जी ने सात दिन तक सारे सुख दिए पर उस समय भी वो स्थिर रहे और उसके बाद वो दरबार में गए तो जनक जी ने एक दूध का कटोरा दिया और कहा - कि आप जाकर मेरे महल की सात बार परिक्रमा कीजिए और एक बूंद दूध नहीं गिरना चाहिए  तो उनसे एक बूंद दूध भी नहीं गिरा तो जनक जी ने कहा - कि आपको कुछ भी जानने की जरूरत नहीं है आपने सबकुछ खुद ही जान लिया है । आप इतने स्थिर है कि द्वार पर जब आपको किसी ने कुछ नहीं कहा फिर भी आप स्थिरप्रज्ञ रहे. और महल में ऐष्वर्य को देखकर भी स्थिर रहे. और दूध की एक बूंद भी आपने गिरने नहीं दी.  आपको कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं और वापिस वेद व्यास जी के पास भेज दिया.

 

 

और व्यास जी ने कहा - कि बेटा ! तुमने अपने आप में सोलह वर्ष में सबकुछ सीख गए और जनक जी को ही क्यों चुना था क्योंकि उनको जीवन में बहुत ज्ञान था लोगों ने उनकी परीक्षा लेनी चाही तो जनक जी जब अपने गुरू से प्रवचन सुनने जाते थे. तो पूरी प्रजा जाती थी तो गुरूजी जब तक प्रवचन नहीं सुनाते थे जब तक जनक जी नहीं आते थे तो सब लोग उनसे जलते थे ऐसा क्या है ? इनमें अब गुरूदेव ये बात समझ गई तो उन्हेंने लीला की.

 

एक दिन प्रवचन में एक व्यक्ति दौडता हुआ आया और बोला - कि जनकपूरी और उसके आसपास के गाँव में आग लग गई तो सबके घर जल रहे है तो सारे लोग भाग गए. सारे ऋषि भी भाग गए तो जनक जी अकेले वहा बचे, तो गुरूजी सिर्फ उन्हें ही प्रवचन देन लगे. और जब सब लोग लौट कर आए क्योकि आग लगी ही नहीं थी, तो बोले कि आप ने झूठ क्यों कहा तो गुरूजी ने कहा - कि आप सब के मन में ये प्रष्न था कि जनक जी क्यो महतवपूर्ण है तो उनको कुछ सीखने की जरूरत नहीं है उनकी महानता देखो वो किसी भी बात से विचलत नहीं होते है । ऐसे कई उदाहरण है जनक जी के जीवन के.

 

कहने का मतलब ये व्यक्ति पर निर्भर करता है कि हम किस उच्चकेाटि तक सीख सकते है । पूरी जिदंगी निकल जाती है पर व्यक्ति की सीख खत्म नहीं होती.

 

प्रसंग ४-  एक बार एक व्यक्ति जहाज पर जा रहा था तो उसमें एक देश से दूसरे देश बहुत दिनों तक पहुॅचते है अब उसने देखा कि एक बाबा अस्सी साल का है और बैठा कुछ पढ़ रहा है , तो वो रोज ही यहीं देखता कि किताब खोलकर पढते है तो वो व्यक्ति बाबा के पास गया और बोला - कि बाबा आप क्या पढ रहे हो तो बाबा कहते है कि तुम कहाँ जा रहे हो तो व्यक्ति बोला कि मै जापान जा रहा हूँ । मुझे वहाँ कुछ सीखना है वहाँ के धर्म गन्थ,और अब वह बोला कि आप क्या कर रहे हो ? तो वो बाबा बोले-  कि मै चीनी भाषा सीख रहा हूँ तो वो हॅसने लगा . तो बाबा बोले कि बेटा सीखने की कोई उम्र नहीं होती और बेटा तुम इतने दिन मुझे देखते रहे तुमने अपना समय बर्बाद किया. इतने में तुम क्या नहीं सीख लेते तो वो व्यक्ति बाबा के चरणों में गिर पडा और बोला कि-  बाबा में जो चीज में सीखनें जा रहा था तो वो मै ने यहीं सीख ली उसका पहला पाठ यहीं है कि सीखने की कोई उम्र नहीं है.

 

कहने का मतलब है कि संभावनाएँ कभी खत्म नहीं होती हम अपने को बहुत बडा ज्ञानी समझ लेते है हमें बहुत सीखना है । वेदव्यास जी ने कितना लिखा है कि व्यक्ति का पूरा जीवन निकल जाएगा पर वो पढ नहीं पाएगा.  इतना ज्ञान भरा हुआ है और हम जितना सीखते है हमें हमेषा यहीं लगना चाहिए कि हमें बहुत  कुछ सीखना है अभी क्योंकि जिसके अंदर ये भाव आ गया कि हम बहुत बडे ज्ञानी है सब आ गया तो वो बहुत बडा अज्ञानी है  हमेषा छोटा बनकर सीखने के लिए प्रयास करना चाहिए जीवन में छोटी से छोटी सीख भी काम आती है तो हमें अपनी संभावनाओं को बढाना है ।

 

“राधे-राधे”


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