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यात्रा

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलों के लिए भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये.

 

गोविंद मेरो है गोपाल मेरो है श्री बाँके बिहारी नन्द लाल मेरो है .......  

 

आज का सत्संग आज का सतसंग का विषय है । “यात्रा”. तो ये जो हमारा जीवन है वो एक यात्रा है जैसे हमें किसी एक जगह से दूसरी जगह जाना होता है तो हम जो सफर करते है वो यात्रा होती है । तो ये जीवन भी एक यात्रा है. और ये यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है और ये यात्रा हमें अपने ही भरोसे पूरी करनी है इसमें हम किसी दूसरे के भरोसे यात्रा नहीं कर सकते और हमें सहारे की आवष्यकता पडें तो परमात्मा का सहारा लेना है । सहयोग लेना है तो संसार का ले सकते है । लेकिन संचालन हम दूसरे के हाथ में नहीं दे सकते, संचालन हमें यात्रा का खुद ही करना पडेगा .प्रेम से कहिए श्री राधे

 

तो हमें अपने जीवन की यात्रा खुद ही पूरी करनी है सहारा हमें सबका लेना है क्योंकि परमात्मा के सहारे के बिना जीवन की यात्रा पूरी नहीं कर सकते है पर करनी तो हमें ही है इस जीवन की यात्रा में कहीं रूकने का काम नहीं है , यात्रा में रूका नहीं जाता. जब तक हम मंजिल पर नहीं पहुँच जाते. तो जीवन की यात्रा में रूका नहीं जाता, बसने जैसी चीज नहीं होती. कुछ देर का ठहराव होता है । वो कुछ समय का होता है ।

 

प्रसंग १. - जैसे एक संत थे वो शहर के बाहर रहते थे उनकी कुटिया ऐसी जगह थी कि वहाँ से एक रास्ता श्मषान की तरफ जाता था और दूसरा बस्ती की तरफ जाता था तो जब लोग वहाँ से निकलते तो उन संत से पूछतें थें कि बस्ती का रास्ता कौन-सा है तो वो उनको श्मषान का रास्ता बता देते औ्रर जो श्मषान का पूछतें उनको बस्ती का बता देते तो लोग उनसे झगडा करते कि तुम झूठ बोलते हो, तुम पांखडी हो, पर उन संत के लिए तो वो बस्ती शमशान और शमशान बस्ती थी . तो एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि बाबा आप ऐसा क्यों करते हो लोंगों को गलत रास्ता क्यों बताते तो तो वो बोलते है कि जो बस्ती है वहाँ केाई स्थाई रूप से बस नहीं सकता वहाँ बसने का तो नामोनिषान भी नजर नहीं आता है । मरने के बाद वो वहाँ से चले जाते है । और जो श्ष्मषान है वहाँ लोग जाने के बाद और कहीं नहीं जाते वहाँ वो हमेषा के लिए स्थाई हो जाते है । वो इसे बस्ती समझते थे मरने के बाद यहाँ से केाई लौटकर जाता ही नहीं उनके वाक्य बडे अर्थपूर्ण होते है ।

 

तो जीवन की यात्रा में बसने का काम नहीं है यहाँ तो बस चलना है । और अगर हम देंखे तो ये संसार परमात्मा का बनाया हुआ घर है । जब हम यात्रा करते है तो उसमें सबसे जरूरी चीज क्या है ? सोचने वाली बात है तो कोई कहेगा टिकिट जरूरी है, तो केाई कहेगा मंजिल जरूरी है, कोई कहेगा पैसा तो इन सब में भी क्या सबसे जरूरी है ? क्योंकि लोग तो बिना टिकिट के भी यात्रा कर लेते है । बिना सामान के भी यात्रा हो जाती है, पर एक चीज है जिसके बिना यात्रा नहीं हो सकती वो है मंजिल.

 

क्योंकि जब तक हमें मंजिल का पता नही होगी, हम यात्रा करेंगे किसकी ? मंजिल का पता होना बहुत जरूरी है. बिना सामान के तो यात्रा कर सकते है । और जीवन की यात्रा में हमें पता होना चाहिए कि हमें जाना कहाँ है हम किस दौड में भाग रहे है । हमें ये पता होना जरूरी है कि हम जा कहाँ रहे है और जीवन की यात्रा की मंजिल क्या है ? तो परमात्मा की प्रप्तिी को ही जीवन की मंजिल मानना चाहिए

 

सामान्य यात्रा में जैसे हमें एक शहर से दूसरे शहर जाना है तो उस का पता होना चाहिए इसी तरह इस जीवन में परमात्मा हमारी मंजिल है और उस तक हमें पहुचना है । सामान ना भी हो तो चलेगा हम देखतें है कि जब हम यात्रा करते है तो समान अधिक हो जाए तो कितनी परेषानी होती है । हम कहीं दूर जाते है, तो  हम सोचते कि क्यों इतना सामान ले आए एक जगह से दूसरी जगह जाने में परेषानी तो नहीं होती हमें खाली हाथ होते तो कितनी आसानी से चल सकते. इसी तरह ये जीवन की यात्रा है इसमें अगर हम सारे सामानों का बोझ लाद लेंगे । तो फिर चलना कठिन हो जाएगा.

 

प्रसंग २. - एक बार का प्रसगं है एक संत थे तो वो प्रवचन सतसंग किया करते थे तो लोग उनके पास सुनने को आया करते थे. तो उसमें एक चोर भी आता था उसे प्रवचन बहुत अच्छे लगते थे संत को पता था कि ये चोर है पर संत की नजरों में सब बराबर है उन्हें लगता था कि ये प्रवचन सुनकर बुद्वि ठीक  जाएगी तो जब सब लोग चले जाते थे तो अंत तक बैठा रहता था और संत से प्रष्न करता था कि आप मुझे भगवान का साक्षात्कार करवा दीजिए. और संत हमेषा टाल जाते थे कि फिर कभी.

 

ऐसा करते-करते बहुत समय हो गया तो वो चोर एक दिन अड गया कि आज आप मुझे करवाओं तो संत कहते ठीक है । तुम कल आना मै तुम्हें भगवान का साक्षात्कार करवाउगाँ .  तो अगले दिन वो आता है तो संत कहते है - तुम्हें मेरे साथ चलना होगा और जैसा मैं कहता हूँ वैसा करना पडेगा वो कहता ठीक है - तो वो बोलते है - कि इस पहाडी पर चलना है उपर जाकर साक्षात्कार होंगे. तो वो चोर कहता ठीक है. चलो तो संत कहते है ऐसे नहीं अपने सिर पर चार पाँच पत्थर रखकर चलना है । उस व्यक्ति ने अपने उपर पत्थर रखे ओर संत के पीछे चलना लगा तो कुछ देर बाद वो कहता कि मेरा बोझा कम करो.

 

संत ने एक पत्थर उठाया फेक दिया और कहा - अब चलो तो थोडी देर बाद वो बोला कि मै थक गया हूँ ये पत्थर कम करो. तो संत ने दूसरा पत्थर भी उतरवा दिया तो हर बार वो यहीं बोले कि बहुत लंबा रास्ता है . अब मै ये बोझ नहीं ले जा सकता तो संत ने उसके सारे पत्थर उतरवा दिए और वो खाली चलने  लगा और बडी आसानी से उपर पहुच गया तो संत ने उपर पहुच कर कहा कि तुम्हें कुछ समझ में आया तो वो कहता है कि नही

 

तो संत कहते है कि ये जो जीवन की यात्रा है इसमें बोझ था तुम्हारे उपर उसके चलना कितना कठिन है और जब वो बोझा कम हो गया तो यात्रा कितनी सरल हो गई ऐसे ही जीवन की यात्रा है ।  अगर तुम अपने सिर पापों का बोझ रखकर चलोगे तो तुम चल नहीं पाओगे और जब तुम इस बोझ को कम करते जाओंगे तो तुमने देखा कि यात्रा कितनी सरल हो गई बस यहीं भगवान का साक्षात्कार है.

 

तुम जितने जल्दी  अपने उपर से पापों का बोझ उतार दोगे उतने जल्दी परमात्मा तुम्हें मिल जाएगे  अपने इन पापों को उतार कर फेंक दो  हम अपने जीवन की यात्रा में बहुत सारा सामान रख लेते बल्कि हमें पता है कि जितना भी चीजें रखेंग्र उतना ही हमारा चलना कठिन हो जाएगा पर हम दुनिया भर का सामान इकठठा करते फिरते है ।

 

प्रसंग ३.  - एक बार का प्रसगं है कि एक व्यक्ति था उसे चीजें इकठठी करनें का शौक था वो तीर्थ में भी जाता तो जो मिलता ले आता अब इतना सारा सामान इकठठा हो गया एक बार वो कहीं गया तो उसे पता चला कि यहाँ एक बहुत प्रसिद्व संत रहते है तो उसकी इच्छा हुई कि उनसे जाकर मिला जाए तो वो उनके पास गया तो उसने सोचा कि इनका बहुत बडा आश्रम होगा जमीन होगी इनके बहुत चेले होंगे पर जब वो गया तो उसने देखा कि यहाँ पर तो कुछ नहीं है संत तो एक कुटिया में रहते है और कोई भी उनके साथ में नहीं है एक पानी का मटका बस था तो से बडा दुख हुआ कि आश्रम में केाई वस्तु ही नहीं है तो वो बोला कि बाबा आपका सामान कहाँ है ।

 

तो संत कहते है कि यहीं मेरा सामान है और तुम्हारा सामान कहाँ है । तुम बताओ तो वो कहता है कि मेरा सामान तो मेरे घर पर है मै तो अभी यात्रा पर निकला हूँ तो वो बोले कि यात्रा पर तुम सामान लेकर क्यों नहीं आए तो वो कहता कि आप कैसे बात करते हो यात्रा में अपना सारा सामान लेकर कैसे चल सकता हूँ तो संत कहते है कि यहीं तो मै तुमसे कहता हूँ कि इस दुनिया में मै मुसाफिर हूँ और अगर हमसब  मुसाफिर है तो सारी सामान अपने  साथ लेकर जाने का क्या मतलब जबकि हमारा शरीर और ये सामान दोंनों नश्वर है । तो जितना हम सामान का बोझा कम रखेंगें उतनी ही यात्रा सुगम रहेगी तो तीन चीजें है मंजिल सामान ओर मुसाफिर हम भी मुसाफिर है और जो हम से मिल रहे है वो भी मुसाफिर है ।

 

हम देखते है यात्रा में थोडी देर के लिए व्यक्ति मिलते है फिर अपनी मंजिल के लिए चले जाते है ।  दोनों गाडी में तो बै।ठें नहीं रह सकते किसी केा कही उतरना और किसी केा कहीं इस जीवन में कई मुसाफिर मिलेंगे पर अगर हम उनमं बॅध गए तो मुजिल पर कभी नहीं पहुच पाएगें । हमें मोह में इतना नहीं पडना है कि हम अपनी मंजिल को ही भूल जाए बिना टिकिट केाई यात्रा करता है तो सजा होती हे जुर्माना लगता है तो ये टिकिट क्या है ये धर्म ही तो है हमें धर्म का टिकिट ही अपने पास रखना है ।

 

हम देखते है कि टीसी जब चैक करता है तब हमारे पास टिकिट नहीं होता तो जुर्माना लगता है तो ये टी सी कौन है  हमारे गुरु जो हमें धर्म के बारे में बताते है । अगर धर्म का टिकिट नही होगा तो यात्रा नहीं कर सकते अधर्म के टिकिट पर यात्रा पूरी नहीं होती है । तो परमात्मा से जुडे रहो हम देखते है कि टिकिट पर टीसी साइन करता हे तो धर्म के टिकिट पर गुरू अपनी मुहर लगा देते है कि तुम धर्म पर चल रहे हो ऐसे ही चलते जाओ तुम्हें मंजिल मिलेगी हम देखते है

 

कि यात्रा में एसी डिब्बा भी होता हे, फस्ट क्लास, सेंकंड क्लास भी होता है. ऐसे ही जीवन में किसी को अमीरी है किसी को गरीबी है. और कोई सामान्य तो ये हमारे पूर्व जन्मों का कर्म है । तो किसी की यात्रा संघर्षमय बीत जाती है तो किसी की सुखमय पर ये मायने नहीं रखता. मायने रखती है मंजिल एसी वाला भी और सामान्य वाला भी दोनों मंजिल तक पहुचते है । पर अगर मंजिल का पता नहीं है तो वो भटक जाएगा ऐसे ही हमारें कर्मों से भगवान ने सुख सुविधाए दी है पर हमनें उस परमात्मा को नहीं देखा तो हम अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुँच पाएगे तो प्रम से कहिए श्री राधे

 

ते ये जीवन की यात्रा हमारी सामान्य यात्रा से बहुत मिलती जुलती है । बहुत सारी चीजें मिलती है भटकन,  व्यक्ति भटक जाता है यात्रा में बहुत सारे लोंगों की गाडीं ही छूट जाती है । नींद लग जाती है कब व्यक्ति भटक जाता है  जब रास्तें में हमें बहुत सारे अच्छे दृष्य दिखते है और व्यक्ति इनमें खो जाता है । हम भी चलना तो शुरू करते है पर बीच में भटक जाते है

 

प्रसंग 4. - एक महात्मा जी थे उनका एक आश्रम था अब नया खोला था पुराना आश्रम भी था तो उन्होंने संदेष भेजा कि नए आश्रम में एक संत की जरूरत है तो उस आश्रम के संत ने दस संतों को भेज दिया तो शिष्यों ने कहा-  कि गुरूजी! खत में तो एक का लिखा था पर आपनें दस संत क्यों भेज दिए ते वो बोले - कि बाद में बताउगाँ तो कुछ दिन बाद संदेष आया कि वो पहुँच गया है. आश्रम में तो

 

शिष्यों ने कहा - कि गुरूजी आपने दस को भेजा था पर एक ही पहुँचा ऐसा क्यों ? उनको आष्चर्य हुआ और बोले कि - मुझे मालूम था कि वहाँ पर एक ही संत चाहिए है और पहुँचेगा एक ही. क्योंकि उस आश्रम से लेकर यहाँ तक बहुत सारे गाँव नंदिया और मोहक दृष्य है । कई नगर है तुम्हें पता कि बाँकि संत कहाँ गए. 

 

तो जब वो यहाँ से गए तो एक नगर पडा वहाँ एक मंदिर पडा उसमें एक मंहत की पदवी खाली थी तो एक संत ने वहाँ जाकर वो पदवी ले ली लालच में बाँकि नौ संत आगें बढ गए वहाँ एक राजा को गुरू की जरूरत थी. तो एक वहाँ चला गया अब आठ संत आगें बढ गए ऐसा करते करते सब रूक गए और नए आश्रम तक एक ही व्यक्ति पहुँच पाया.

 

यहीं हमारे साथ है हम चलना तो शुरू करते है पर बीच में ये जो लालच है इसी में अटक जाते है । मंजिल पर चलना तो सब शुरू कर देते हे पर उस परमात्मा तक कोई एक ही पहुच पाता है तो वो विरला कौन है, जो बीच में लालच में ना फसें, पद के जाल में ना, मोह में ना फॅसें, जैसे वो एक ही संत पहुचा उसे किसी मोह ने नहीं रोका उसे अपनी मंजिल दिख रही थी. कि मुझे जाकर नए आश्रम को सम्हालना है । जिसकी मंजिल साफ हो उसे वो लालच लुभाता नहीं है वो बाधाओं को हटाता है ।

 

भटक कौन जाता है जो बीच के रास्तों में ही  उलझ कर रह जाता है । मंजिल को ही भूल जाता है हमसब के जीवन की यात्रा में हमारा लक्ष्य वो परमात्मा है । ये बीच में सारे रिष्ते, नाते, पद, मिलते है इन सबके एक तरफ करके चलना है । कर्तव्य समझकर निभाना है. पर फसॅना नहीं जो फसाँ वो भटका. हम ऐसे रहते है कि हमें जन्म मिला है और हम ऐसे रहते है जैसे हम हमेंषा के लिए यहाँ आए है अपने शरीर की ऐसे देखबाल करते है कि ये शरीर हमारे साथ ही रहेगा हमेषा यात्रा में जितना मोह का, लोभ का बोझा कम कर देंगे उतनी ही यात्रा आसान हो जाएगी.

 

“राधे-राधे”

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