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वास्तविक संपत्ति

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आइए आज का सतसंग षुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवान नाम का कीर्तन करेंगे ।

“श्रीराधे गोपाल, भजमन श्री राधे, श्री राधे जय-जय राधे.....”

श्री बाँके बिहारी जी और राधारानी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “वास्तविक संपत्ति”  यदि  हम शारीरिक और संसारिक दृष्टिी से देंखें तो संपत्ति की सीधी सी परिभाषा है कि व्यक्ति जो भी कमाता है । वहीं उसकी संपत्ति है । अगर हम आध्यात्म में देखे, तो संतो ने दो तरह की वास्तवकि संपत्ति बताई है । पहली तो वो जो व्यक्ति दान में देता है । वो उसकी संपत्ति है । जो कुछ भी उसने दान में दिया है । और दूसरा जितनी मात्रा का हम स्वयं उपभोग करते है वो हमारी संपत्ति है ।और जितना चाहे हम उपभोग करे ऐसा नहीं है.  

संतो नें तो ये कहा है कि व्यक्ति का एक वक्त में जितने में गुजारा हो जाए वहीं उसकी संपत्ति है । और उपभोग का ये मतलब नहीं कि हम अपनी जरूरत से ज्यादा उपभोग करें । तो ऐसे दो तरह से बताया गया है एक वो जो दान करते है दूसरा वो जो उपभोग करते है । जिदंगी में हर व्यक्ति को एक दिन मर जाना है और उसके जो भाई है, बेटे है, पत्निी है, वो दूसरे लोग ही. जैसे किसी व्यक्ति ने बहुत सारी संपत्ति जोड जी है तो उसके मरने के बाद वो सारी उसके परिवार में ही बटेगी । उसका उपभोग ये ही लोग करेंगे.

संत कहते है जब व्यक्ति को एक दिन मरना ही है । तो फिर जोडकर क्या फायदा है । वास्तव में जो हमनें खर्च की है जिसका उपभोग किया है वो ही संपत्ति हमारे साथ जानी है ।  शरीर तो अस्थिर है तो फिर संपत्ति बढाने से क्या फायदा, तो संपत्ति बढाने के साथ-साथ धर्म में वृद्वि करनी चाहिए, उसका सबसे अच्छा तरीका है “दान” संत कहते है कि मरने के बाद से शरीर भी साथ में नहीं जाता है तो व्यक्ति के धर्म कर्म होते है वहीं उसके उपर काम में आते है । इसे हम ऐसे समझ सकते है.

प्रसंग १-  कर्ण के जीवन को हम सभी जानते है उनके नाम के आगें दानवीर लगता था वो बहुत दान करते थे लोग उन्हें दानवीर कर्ण कहते है । कोई भी उनके दरवाजे से खाली नहीं जाता था. जब वो मरे तो संत कहते है कि उनको उत्तम लोक मिले. कहते है कि जैसा व्यक्ति दान करता है वैसा ही उसको लोक मिलता है  तो उन्हेांनें अच्छे कर्म किए थे कि उनको वो लोक मिले जिसमें सबकुछ. पर एक बात की कमी थी वहाँ कहीं खाने की वस्तु नहीं थी तो जब कर्ण ने देखा कि यहाँ पर तो धन ही है तो उन्हेांनें देव दूतो से पूंछा - कि खाने की केाई वस्तु क्यों नहीं है ? तो दूतों ने कहा - कि आपने धन तो बहुत दान किया, पर अन्न दान नहीं किया आपने इस पर विष्वास नहीं किया तो आपका महल रत्नों से भरा है । तो उन्हेांनें  दूतो से कहा - कि क्या मै पृथ्वी पर कुछ समय के लिए जा सकता हूँ ? मैने केाई ऐसा पुण्य काम किया है. तो दूतों ने कहा - कि आप जा सकते हो. तो कर्ण ने पृथ्वी पर जाकर अन्न दान किया. और जब लौटकर आए तो देखा-  कि महल में अन्न के भंडार है ।

कहने का अभिप्राय कि धन हर कोई कमाता है पर धन का सही उपभोग है दान करना. वहीं हमारी वास्तविक संपत्ति है । वहीं हमारे साथ जाना है । इसलिए हमें धर्म में वृद्धि करना है । क्योंकि वहीं व्यक्ति की वास्तवकि संपत्ति है । कई व्यक्तियों का ये मानना है कि धन के बिना कुछ नहीं हो सकता तो धन जरूरी है पर जो व्यक्ति धन कमाने के बाद उसका सही उपयोग ना करे तो भले ही वो मेहनत की कमाई का हो आगें जाकर वो धन खुद की और पूरे परिवार की बुद्वि खराब कर देता है । किसी संत ने कहा है-  कि जैसे कुआँ होता है उसका पानी निकालते है तो उसमें और पानी आ जाता है वो कभी खाली नहीं होता है । ऐसे दान करने से धन की शुद्वि होती है । जैसे स्नान करने से शरीर की शुद्वि होती है । मन की शुद्वि ध्यान करने से होती है । और दान करने से धन कि , उस कुएँ की पानी की तरह निर्मल हो जाता है  पर हमारी विडंबना है । कि हम दान देने से कतराते है और देने वाला अहंकारी हो जाता है । कहते है कि जितने में हमारे एक समय का गुजारा हो जाए उससे ज्यादा संपत्ति रखना पाप बताया गया है । हम ऐसा तो नहीं कर सकते हम बहुत कुछ जोड लेते है तो उस धन की शुद्वि के लिए ही हम दान करते है । हम दूसरे के लिए नहीं करते है । लोक में और परलोक में दोंनो जगह वो काम आता है आवश्यकता से ज्यादा धन बुद्वि को खराब कर देता है ।

प्रसंग २- एक बार का प्रसंग है । कि गुरूनानक जी एक बार काषी गए तो वहां के नवाब उनको बहुत मानते थे तो उन्हेांनें उनसे पूछा - कि आपकी भक्तिी का ज्यादा महत्व है,या कि मेरी दौलत का तो नानक जी ने कहा - कि मै इसका जवाब फिर कभी दूगाँ । अब उनका प्रवचन था तो उस नवाब से कहा कि तुम सोने की मुहरें लेकर आना तो एक जगह उनका प्रवचन चल रहा था तो वहाँ वो सोने की मुहरों को लाकर नानक जी के पास रख दी और पीछे बैठ गया तो नानक जी ने कुछ मुहरें उठाकर गंगा जी में फेंक दी और वो ऐसे मुठठी भर-भर गंगा तो जो लोग देख रहे थे वो उठकर कूद गए पानी में और सभी में आपस में लडाई होनें लगी उन मुहरों के लिए मारपीट शुरू हो गई. अब नवाब ने देखा कि ये क्या हो रहा है ।

तो नानक जी ने कहा - कि जो मुहरे मैने फेंकी है वो नकली है । तो सारे लोग आकर वापस बैठ गए तो नानक जी ने नवाब से कहा कि देखो जब प्रवचन में लोग सबकुछ भूलकर भक्तिी में डूब जाते है । पर माया लोगों को सर्वनाष की ओर ले जाती है दौलत लोगों को विखंडन का रास्ता दिखाती है । तो नवाब की समझ में आ गया कि संपत्ति लगती तो अच्छी है पर विनाष की आरे ले जाती है नवाब ने गुरूनानक जी के पैर पकड लिए ओर वो समझ गया कि मुझे दौलत का अंहकार हो गया था इस धन की तुलना कहाँ आपके प्रवचन से कर दी धन हर काम में आता है धन के बिना धर्म नहीं हो सकता है पर दान के बिना धन का नाष है । हम क्यों आगें की पीढी की सोचकर कमा कमा के रखें अपने धन का खुद ही उपयोग ना करें. अगर पुत्र कुपुत्र हुआ तो सारा धन बर्बाद कर देगा और सुपुत्र हुआ तो स्वयं सब जोड लेगा,

हमें ये जीवन कितनी मुष्किल से मिला है कहते है कि चौरासी लाख यौनियों के बाद से मानव तन हमें मिला है । इनमे हम क्या-क्या नहीं बने होंगे. पषु पक्षी सबकुछ. तो उन सब में हमने खाना-पीना सोना जैसे जानवर करते है चिडिया जैसे दिन भर दाना चुनती है । और घोसलें में लेकर आती है । और अगर हम मनुष्य तन में भी यहीं करें तो जानवर में और हम में क्या फर्क है ।भगवान ने बुद्वि सिर्फ हमें ही दी है यहीं अंतर है जानवर में और इंसानों में अगर इस जीवन में हम यहीं सब करते रहे तो क्या किया

व्यक्ति सोचता है कि जब हम सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएगें तब दान करेंगे तो वो कभी भी मुक्त नहीं हो पाता है । मोह और माया इतनी प्रबल है कि इससे व्यक्तिम मुक्त नहीं हो पाता है । आज खुद के लिए धन कमाया है कल बच्चों के लिए फिर उनकी शादी करने में व्यक्ति का सारा जीवन इसी में निकल जाता है । फिर बुढापे में हाथ पैर नहीं चलते है । तो भगवान भी कहते है कि जिसने समय रहते भजन नहीं किया दान नहीं किया तो भगवान उसे मोह में ढकेल देते है । वो उसके बाहर नहीं निकालते है । इसलिए अपने जीते जी धर्म की वृद्वि करनी चाहिए क्यांकि जितनी भी चीजें है । शरीर के खत्म होते ही सब खत्म हो जाती है । पर ये धर्म साथ में रहते है ।

लोग कहते है कि हमारी किस्मत ही ऐसी है. तो ये हमनें खुद बनाई है जो हमनें पिछले जन्म में किया हे वो हम आज है और जो हम आज करेंगे वो हम अगलें जन्म में होंगें । तीनों ही हमारे सामनें है तो हमें देखना है कि इस जीवन में हम एक का भी जीवन संवार दे उसके चेहरें पर खुषी ले आएँ दुखी करना तो आसान है । केाई एक व्यक्ति भी सुधर जाएँ तो समझ लेना कि परमात्मा की कृपा हमारे उपर है । क्योंकि करने वाले तो परमात्मा है हम तो माध्यम है । इसलिए अपनी संपत्ति का उपयोग करना हमें आना चाहिए है । जो गृहस्थ है उनकी संपत्ति तो दान है । जो सन्यासी है उनको तो संपत्ति से लेना देना ही नहीं है वो तो गृहस्थ पर ही निर्भर है तो उसकी वास्तविक समपत्ती तो वैराग्य है ।

प्रसंग ३- चैतन्य महाप्रभु जब सन्यास को निकले भारत की यात्रा तो उनके साथ एक षिष्य था गोंविद दास वो उनकी सेवा करते थे तो एक दिन खाने के बाद उन्हेांनें गोविंद से सामनें हाथ फैलाया तो उसने एक हरीतिका का टुकडा उनके हाथ में रख उिया तो वो महाप्रभु ने खा लिया. फिर दूसरे दिन कही दूसरी जगह पर वो रूके तो वो षिष्य भिक्षा माँगकर लाया और खाना खाने के बाद महाप्रभु ने जैसे ही गोविंद से मगाया तो उसने फिर से हरीतिका का टुकडा दे दिया.

तो महाप्रभु ने कहा - कि ये कहाँ से आया? तो गोंविद दास जी ने कहा - कि मैने कल बचा के रख लिया था, तो महाप्रभु ने कहा - कि तुम अभी यहीं से वापिस लौट जाओ. आज के लिए कल ही संग्रह करके रख लिया .आज तुमने एक छोटा सा टुकड़ा रखा है आगे फिर जाने क्या संग्रह कर के रख लो तुम अभी सन्यास के लायक नहीं हो. तुम्होर अंदर अभी संचय करने की प्रवृत्तिी है । ये मेरे ये दूषित है सन्यास का मतलब है पूर्ण वैराग्य है । मै तुम्हें सेवा से मुक्त करता हूँ ।

इस प्रसंग से वो हमें बता रहे है कि छोटा सा संग्रह हमं मोह में डाल देता है । उन्हेांनें अपने नियम बना रखें है । कि संग्रह नहीं मतलब नहीं एक सन्यासी की समपत्तिी है “त्याग और वैरागय” एक गृहस्थ की समपत्तिी है - दान और धर्म. प्रेम से कहिए श्री राधे तो हमें अपने जीते जी अपने धन को दान में लगाना है कैसे हम उसका सदुपयोग करें ये हमें देखना है । ये जीवन बडा अनमोल है.  व्यक्ति की मौत पूछ कर नहीं आती है केाई ये नहीं कह सकता कि आने वाले पल में वो रहेगा कि नहीं इसलिए हमें जो है वो आज ही करना है दान कोई-सा भी अन्न दान हो, धन का दान हो, ये नहीं कर सकते है शारीरिक दान करें कही कथा में हमनें शारीरिक कार्य कर दिया तो वो भी दान के बराबर है । बस यहीं व्यक्ति की वास्तवकि समपत्तिी है ।

 

                                                   “राधे-राधे” 
 

 

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