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ईमानदारी

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलो के लिए बड़े प्रेम और भाव से भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ..

“प्रिय राधे, श्री राधे,राधे राधे राधे प्रिया जय राधे राधे ... 

श्री राधारानी जी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है “ईमानदारी” तो ये क्या है? जब हम निष्पक्ष और न्यायपूर्ण निर्णय लेते है चाहे वो हमारे परिवार या समाज का मेटर हो तो वो न्यायपूर्ण निर्णय ही ईमानदारी है । जिसमें कोई पक्ष ना हो हमारा कोई स्वार्थ ना हो, प्रेम से कहिए श्री राधे. न्याय पूर्ण निर्णय का नाम ही ईमानदारी कहलाता है.

बहुत सी जगह बेइमानी ज्यादा है व्यक्ति बाहर से भले ही बेईमानदार हो. पर दो जगह उसकी बेईमानदारी नहीं चलती. “एक परमात्मा और दूसरा स्वंय” वो खुद से कभी भी बेइमानी नहीं कर सकता उसकी अंतर आत्मा साक्षी व्यक्ति जब किसी दूसरे के प्रति कोई भी कर्म करता है किसी से बैर भाव है और हम उसके प्रति गलत काम करते है तो ये बात किसी को नहीं मालूम पर ये करते हुए हमने खुद से ही बेइमानी कर दी. तो जैसे ही हमने दूसरे के लिए गलत काम किया तो ये किसी ने नहीं देखा अंदर बैठा वो परमात्मा हर बात का हिसाब लगाता है ।

कहते है कि जैसा भाव होगा कर्म तो व्यक्ति बाद में करता है । कर्म के प्रति हमारा भाव कैसा है तो हमें खुद के प्रति ईमानदार होना है. शरीर के साथ ईमानदार होते है हम उसकी देखभाल करते है । पर हम अपनी आत्मा की नहीं करते पर हम सबको मालूम है कि ये जो हमारा शरीर है जब तक हम है तक तब साथ है. इसके बाद जैसे मृत्यु आएगी वैसे ही सबसे साथ छोड देगा. तो हम आत्मा के साथ निष्पक्ष नहीं हो पाते हम शरीर से इतना लगाव करते है कि उसी को सबकुछ मान लेते है । ये मोह नहीं छूटता परिवार वालों के साथ न्याय करते है । व्यक्ति अपने परिवार के लिए कमाता है पर कमाते हुए उस  कर्म को करते हुए बहुत से गलत काम करते है । बल्कि हमें पता कि कर्म का फल हमें ही भुगतना है । परिवार के किसी भी व्यक्ति से पूछा जाए कि कर्म के भागी हो तो वो कहेगा नहीं. तो हम स्वयं के प्रति हम ईमानदार नहीं हो पाते.

तो मन को कहीं भी जाने देते है । मन में विचार आते है फिर वो आदत और उसके बाद स्वभाव बन जाता है । फिर संस्कार बन जाते है तो वो हम कैसे निभाएगें,जब मन में बुरा विचार आया. तो ये शरीर के साथ तो ईमानदारी दिखा दी पर आत्मा कें साथ और मन के साथ हम बेइमान बन गए. तो हमें बाहरी ईमानदारी तो जरूरी है पर सबसे पहले अपने अंदर ईमानदारी की जरूरत है ।

प्रसंग १- जैसे एक बार का प्रसंग है एक महात्मा थे वो अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे, तो रास्ते में देखा कि एक सांप पडा है उसके बुहत-सी चींटिया लगी है पर वो जिदां है हिलता डुलता है पर चींटी कम नहीं होती है । हजारों चीटियाँ लगी है तो संत देखते है, तो वोसर्प फन उठता है और बार-बार गिर जाता है । तो वो गुरू रोने लगे. शिष्यों को दया आई कि ये सांप बहुत कष्ट है. शिष्य ने कहा –आप क्यों रोने लगे तब तो गुरू कहते है - कि मैने अपनी दिव्य दृष्टिी से इसका पिछला जन्म देखा है मै तुम्हें इसकी कहानी बताता हॅू । ये जो सांप है पिछले जन्म में ये एक गुरू था, इसके बुहत शिष्य थे, ये सबसे सेवा लेता था, सबसे पैसे भी लेता था, गृहस्थों से भी, पर किसी का आत्म कल्याण नहीं करता था । गुरू बनना बुहत कठिन है ।चेले बनाकर उनकी सेवाए लेकर उनका आत्मकल्याण नहीं करे तो उसकी ऐसी ही दशा होती है जो आत्म कल्याण नहीं करता. और जो ये चींटियाँ लगी है ।

वो सारे शिष्य है,और उससे बोल रहे है कि तुमने सेवा तो ली पर हमारा आत्म कल्याण नहीं किया तुमने धोखा क्यों दिया वो गृहस्थ है वो इसे काट रहे है । ये तो सांप बनकर पडा है और वो सारे शिष्य और लोग चींटी बनकर इंसाफ माँग रहे है । तो वो गुरू बता रहे है कि गुरू बनकर जो तुम्हारे अधीन है तुम उनका आत्म कल्याण नहीं करोगे उनके साथ छल करोगे तो उसाक क्या परिणाम है जो हमनें दूसरों का लिया है वो हमारे साथ ही निकलना है । तो ये सांप बता रहा है । प्रेम से कहिए श्री राधे

हमें लगता है कि हम तो हमेशा अच्छा ही करते है फिर परमात्मा हमारे साथ बुरा क्यों करता है तो ऐसा नहीं है । वो हमारे साथ कभी गलत नही करता है । वो तो हमारे कर्मों के साक्षी है हम अपनी बेइमानी की वजह से दुखी है । और आज हम सुखी है । तो अपने कर्में की वजह से, तो गुरू बता रहे है कि तुमने दूसरे के साथ बेइमानी की तो लोग भूल जाते है कि हम वो कर्म अपने लिए ही कर रहे है । हम ऐसा करके खुद के साथ बेइमानी कर रहे है । कर्म को करते वक्त हमारा भाव कैसा था ये वो परमात्मा देख लेता है । व्यक्ति दूसरे के अवगुण तो देख लेतें है । पर हम ये भूल जाते है कि वो अवगुण हम अपने अंदर ले लेते है उसके साथ क्या दुर्गति हुई वो तो हमें नहीं पता, पर हम अपना जीवन तो बिगाड लेते है ।

प्रसंग २ - एक बार का प्रसगं है । एक साधु थे उनका मन जहा लगता था वहीं बैठ जाते थे तो एक बार की बात है कि साधु कहीं घुम रहे थे तो नीम का पेड दिखा तो उसके नीचे धुनि रमा के बैठ गए तो उस पेड के सामने वैष्या का घर था । जब साधु की दृष्टिी उस वैष्या के घर पर पडी तो वो अपनी धुनि ही भूल गए उसके घर को देखते क्योंकि वहाँ पर लोग दिन-रात आते जाते रहते थे । और उन्हें पता नहीं क्या सूझी जैसे ही एक व्यक्ति आता उस वैष्या के घर, तो एक पत्थर उठाकर धुनि के पास रख देते दूसरा आता तो दूसरा पत्थर रख देते अब ऐसा करते-करते बुहत दिन हो गए.

तो एक दिन वैष्या घर से  निकली तो साधु ने उसके बुलाया कहा कि इन पत्थ्रों के ढेर को देखो तुम बहुत पतित हो पाप किए है जितने ये पत्थर डले है, ये लोग रोज तुम्हारे पास आते थे तुम बहुत पापी हो  तो वो घबरा गई कि मैने तो इतने लोगों की जिदंगी खराब कर दी. अब तो वह पश्चाताप करने लगी और साधु से बोली - कि आप मुझे उपदेष दो पर साधु ने उसे निकाल दिया तो वो घर जाकर रोई. और उसी समय उसने वो वृत्तिी अपने  अंदर से निकाल दी. कहने लगी - परमात्मा मैने बहुत से पाप किए है पर आप तो पतितपावन हो जो अपने पापों का प्रायष्चित कर लेता है आप उसे तार देते है तो जिस समय वो ऐसा कह रही थी. उस समय उसको इतनी ग्लानि हुई कि वो उसी समय मर गई और वो सीधी बैकुण्ठ लोक गई. और जो साधु थे उनको लेने यम के दूत आए तो वो बोलते है कि मैने तो तप किया है तुम क्यों लेने आए हो मुझे यमदूत बोले - कि आपका हिसाब तो यमराज करेंगे. तो वो बोले कि साधु तुमने तप किया पर वैष्या के अवगुण गिने तुमने और सदा पाप का चिंतन किया. तो वो तुम्हारी तपस्या कोई काम की नहीं. तो तुम्हें नरक मिलेगा और जो वैष्या थी उसके पापों का प्रायष्चित किया तो उसको भगवान के दूत बैकुण्ठ ले गए.

तो कहने का तात्पर्य क्या दूसरों के अवगुण को देखते-देखते हम खुद के साथ बुरा करने लगते है हम दूसरों का पाप देखते उसका चिंतन करने लगते है । हम बेइमानी करते है अपने से, मन एक बार चंचलता करता है । पर भोगना कई जन्मों तक पडता है । मन एक बार मोह में फसा उसने अवगुण देखे तो उसका हिसाब हमें चुकाना पडता है ।

तो जैसे साधु सांप बन गए थे. तो दूसरों के साथ बेइमानी करते हम खुद का ही जीवन बिगाड लेते है । व्यक्ति ईमानदारी के कमाए धन को बेइमानी में लगाकर सब कुछ बिगाड लेता है । अगर धन को कमाया पर दान, धर्म में नहीं लगाया तो क्या काम का. वो वो तो व्यर्थ ही गया. लालच व्यक्ति को बेइमान बना देता है । जब मन लालच पर जाता है तो व्यक्ति ईमानदारी से बेइमानदारी की ओर चला जाता है । जब शरीर का लालच होता है । बस करना है, कर्म के प्रति लालच आ जाता है. हर चीज में लाभ-हानि हमें आत्मा और शरीर दोंनो के साथ ईमानदारी करना. परिवार का करते-करते अपने कर्मों के प्रति ईमानदार हेाना है ।हम धन का उपयोग करते करते कही दान न करके हम  बेईमानी शांति से बैठकर देखना है कि हमारा मन कहाँ जाता है ।

हम बैठे है मन कामना की ओर जा रहा है परमात्मा में नहीं लग रहा तो वो हमारे वष में नहीं है । व्यक्ति में डर नहीं है कि कर्म को देखना वाला कोन है पर जब उसके परमात्मा का डर होगा कि जो मै कर रहा हूँ वो गलत है अनीति है तो वो कभी गलत काम नहीं कर सकता है ।

प्रसंग ४- एक बादषाह थे वो बडे न्यायप्रिय थे. एक बार वो रात में नगर में निकले कि देखे क्या हो रहा है तो उन्होंने देखना कि शाही खजाने की लाइट जल रही है । तो वो जाकर बोले - कि तुम अभी तक यहीं हो? आधी रात से भी जयादा हो गई है . तो वो बोला - कि आज धन ज्यादा आ गया है हमारे पास तो मै देख रहा हूँ कि किसका धन ज्यादा आ गया है । तो राजा कहने है - कि ये काम तुम कल भी कर सकते हो, घर जाओ, तो वो खंजाची बोला - कि आप ठीक कह रहे हो. पर जिसका धन हमारे पास ज्यादा आ गया वो कितना परेषान होगा. तो वो हमें बदुआ देगा. तो मै नहीं चाहता कि हमारे राज्य को किसा की बदुआ लगे. ओर वो ये कहे कि राज्य में सुवाई में देर लगे.इसलिए मै किसी कि बद्दुआ राज्य और स्वयं पर नहीं लगाने दूँगा. तो राजा कहते - कि जिस राज्य में तुम जैसा खंजाची हो वो प्रगति ही करेगा तो उस खंजाची के मन में डर था वो अंदर और बाहर दोंनो में ईमानदार था तो उसका साथ तो परमात्मा भी देता है । इसलिए हमें अन्दर और बाहर से ईमानदार होना है

                                                              “राधे-राधे”   

 

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