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निष्ठा

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आइए आज का कीर्तन शुरू करने से पहले दो मिनिट के लिए भगवान नाम स्मरण करें।

“कृष्ण राधे की जय, राधे-कृष्णा की जय, बंशी वाले कन्हैया की जय-जय....”

श्री बाँके बिहारी जी और राधारानी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “निष्ठा” निष्ठा है क्या ? ये बस पहले हमें जानेगें. जब कोई हमसे कुछ भी कहता है और हम उस पर यकीन कर लेते है. किसी ने हमसें कुछ कहा तो हम उस विश्वास कर लेते है । और ये विश्वास आगें चलकर दृढ विश्वास हो जाता है । तीन चीजें होती है-  पहली विश्वास दूसरी दृढ विश्वास और तीसरी निष्ठा.

जब किसी से बात करते है वो हमें समझता है तो हम उसको मान लेते । और धीर-धीरे वहीं विश्वास दृढ विश्वास होता जा रहा है। लेकिन दृढ विश्वास और ने अंतर होता है.निष्ठा क्या है ? जैसे हमनें कल मन की बात थी कि मन मे विचार आते है तो परिपक्व और स्थिर मन से जो हम व्यवहार करते है बस वो ही निष्ठा है । तो इसमे हमें किसकी जरूरत है वो है निष्ठा इसके लिए मन का स्थिर होना बहुत जरूरी है क्योंकि मन हमेषा भौतिक चीजों में लगा रहता है । जब तक मन स्थिर नहीं रहेगा तब तक दृढ विश्वास तो रहेगा पर निष्ठा नही,

प्रसंग १- तो जैसे मान लो एक गांव था वहाँ बहुत दिन तक पानी नहीं बरसा तो गाव के लोग इकठठा होकर प्रार्थना करते है कि कुछ दिन अगर और पानी नहीं बरसा तो अकाल पड जाएगा तो सबने निष्चय किया कि कल हम मैदान में आकर प्रार्थना करेंगे. तो दूसरे दिन सब लोग मैदान में आए हजारों की तादाद में तो उनमें एक लडकी आई वो छाता लेके तो ये क्या है ये निष्ठा है । लोगों ने विष्वास किया कि हम प्रार्थना करेंगे तो विश्वास है कि भगवान पानी बरसा देगें । पर वो लडकी इस विष्वास के साथ निष्ठा भी अपने साथ लाई थी कि पानी गिरेगा ही, तो निष्ठा अटल होती है  कभी टूटती नहीं है । लडकी को दृढ विष्वास के साथ निष्ठा थी. कि  निश्चित ही पानी बरसेगा.तो दृढ विश्वास और निष्ठा में बहुत छोटा सा फर्क है । निष्ठा भी मन से आती है । और विष्वास भी अंदर से पर दोनों में अंतर है । विष्वास में एक छोटी सी कमी रहती है । विश्वास को हम उपरी स्तर पर लेते है । और मन जब स्थिर होता है । जब हमारा मन उस चीज को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करता तो हम विष्वास तो कर लेते है पर वो टूट भी जाता है । क्योंकि मन में ये भी रहता कि अगर नहीं हुआ । निष्ठा में ना शब्द नहीं होता वो तो अटल है । ये बहुत छोटा सा अंतर है कि विष्वास टूट जाता है । और निष्ठा कभी टूटती नहीं है ।


प्रसंग २-
एक वन था उसमें दो लोग तपस्या कर रहे थे दोनों एक-एक पेड के नीचे बैठे थे । नारद जी विचरण करते हुए वहाँ से निकले तो उन्हेंनें पूंछा - कि तुम दोनों कौन हो ? और यहाँ क्या कर रहे हो तो वो बोले-  कि हम दोस्त है । और भगवान के दर्षन पाने के लिए उनकी तपस्या कर रहे है । आप तो भगवान के पास जाते रहते हो तो अब आप जाओ तो उनके से पूछना - कि वो हमें कब दर्षन देंगें । अगर आप इतना कर दे तो आपकी बडी कृपा होगी.


नारद जी ने कहा - ठीक है, मै कह दूँगा. इतना वो भगवान के पास गए. और बोले - कि प्रभु दो व्यक्ति जंगल में आपके दर्षन के लिए तपस्या कर रहे है ।


तो उन्हेंनें पूंछा है -
कि आप कब दर्षन दोगे ?


तो भगवान ने कहा -
कि नारद पहला व्यक्ति जो पेड के नीचे बैठा है । उससे कहना कि मै उसे तीन जन्म बाद दर्षन दूँगा । और दूसरे वाले से कहना-  कि जिस पेड के नीचे वो बैठा है उसमें जितनी पत्तिया है उतने जन्म बाद में उसे दर्षन दूँगा । नारद जी ने कहा –प्रभु ऐसा क्यों तप तो दोनो कर रहे है ?


भगवान बोले - ये मेरी इच्छा है । जाओ बोल दो. तो नारद जी उनके पास गए और जब वो उनके पास आए तो उन लोगों ने पूंछा कि भगवान ने क्या कहा तो नारद जी पहले वाले से बोले - कि भगवान ने कहा कि वो तुम्हें तीन जन्म बाद दर्षन देंगे, तो वो कहने लगा - कि अभी से तपस्या करने से क्या फायदा तीसरे जन्म में ही तपस्या कर लूँगा । उसने अपना आसन उठाया और घर चला गया ।


फिर दूसरे व्यक्ति से कहा -
नारद जी ने कि तुम तो उठो और चले जाओ. उसने पूंछ- कि क्यों? तो वो बोले कि इस पेड में जितनी पत्तिया है तुम्हें उतने जन्म लगेंगे.तो वह व्यक्ति उठा और उठकर नाचने लगा. तो नारद जी ने कहा-  कि तुम ये क्या कर रहे हो । पहले वाला व्यक्ति तो तीन जन्म का सुनकर भाग गया और तुम्हें पता नहीं कितने जन्म लगेंगें. तो वो बोला - कितने भी जन्म लगेंगें पर भगवान आएगें तो सही मुझे दर्शन तो देगे ही.


जहाँ भगवान ने उसका इतना प्रेम देखा तो वो तुंरत प्रकट हो गए. नारद जी बोले - कि भगवान ये क्या आपने तो कहा था कि इस पेड में जितनी पत्तिया है उतने जन्म बाद में दर्षन दूँगा. भगवान बोले - हां पर मै इसकी निष्ठा इतनी थी मुझमें कि मुझे इसी जन्म में आना पडा.

कहने का तात्पर्य ये है कि जो पहला व्यक्ति था तप करने आया उसको विष्वास था और आस्था भी पर निष्ठा में कमी थी । और जो दूसरा व्यक्ति आया उसके अंदर निष्ठा थी तो निष्ठा व्यक्ति को पूर्ण बनाती है । निष्ठा हर एक के अंदर जरूरी है । उसके बिना कोई काम नहीं चलता ये एक अंदर का भाव है अटल है ये टूटती नहीं है । निष्ठा एक ऐसी चीज है । जो अटल है उसमे हमें ना तो मन और ना ही बुद्वि लगानी है । कि ये चीज होगी कि नहीं होगी निष्ठा अटल है । इसमें शंका तो कही आती ही नहीं और नाही आनी चाहिए. ये जो लोग आध्यात्म में है या साधक है साधना में लगे है। उनके लिए ये चीज बहुत जरूरी है । क्योंकि व्यक्ति क्या करता है उसका कोई काम नहीं हुआ तो भगवान बदल लेता है । और उनकी एक दो साल बहुत पूजा करता है । और जब काम नहीं बना तो फिर तीसरे भगवान को पकड लेता है । वो स्थिर रहता ही नहीं है । तो ये क्या है? उसको विष्वास, श्रद्वा तो है । पर अगर निष्ठा होती तो वो अपने इष्ट को छोडकर जिसका जो इष्ट है बस है तो वहीं है उसी पर अटल है । क्योंकि अटलता ही निष्ठा है ।

दुनिया में तीन तरह की निष्ठा होती है । एक होती है "स्वयं में", व्यक्ति कि, अगर स्वयं में नहीं है तो ये सोचेगा कि हम ये नहीं कर सकते वो नहीं कर पाएगें तो ऐसा क्यों व्यक्ति को विष्वास है तो खुद पर लेकिन निष्ठा की कमी है । दूसरी निष्ठा होती है “संसार के प्रति” और तीसरी निष्ठा होती है व्यक्ति की “ईष्वर के प्रति” ये तीन प्रकार की निष्ठा है और ये तीनों जरूरी है । अगर एक भी नहीं हुई तो बात नहीं बनेगी क्योंकि व्यक्ति  को खुद पर ही  निष्ठा नहीं है तो वो संसार में ईष्वर पर नहीं कर पाएगा निष्ठा

जैसे हम बैंक में पैसा जमा करते है तो हमें विष्वास है कि हमारा पैसा वहाँ सुरक्षित है । तब तो हम वहाँ जमा कर रहे है । तो ये है संसार में निष्ठा अब तीसरी है ईष्वर में निष्ठा तो इसके लिए अनिष्ठा न हो मतलब हमारा मन अस्थिर ना हो जब तक मन स्थिर नहीं होगा शांति नहीं आएगी और जब शांति आएगी तो मन भगवान में लगेगा ।

कल हमनें बात की थी कि भौतिक चीजें कभी व्यक्ति को शांति नहीं दे सकती तो जब व्यक्ति भगवान के चरणों में निष्ठा रखेगा वहीं से उसका विकास शुरू होगा व्यक्ति विकसित तभी होता है । नास्तिक व्यक्ति क्या करता है । उसकी स्वंय में और संसार में निष्ठा है । पर ईष्वर में नहीं है चलो मान ले संसार में निष्ठा और खुद पर ये ठीक है अच्छी बात है पर वो ये भूल रहा है कि ये संसार परिवर्तन शील है । हमेषा एक-सा नहीं रहता है । दुनिया में जितनी भी चीजें परिवर्तन शील है इसका मतलब उनका नाष होना है । वो अगर अपने रिष्तो में निष्ठा रख रहा है तो सब रिष्तों का नाष होना है । अगर वो धन पैसों में निष्ठा रख रहा है । तो वो भी नहीं रहेगें उसका भी नाष होगा.

तो कहने का मतलब जैसे ही वो चीज परिवर्तित हुई उसके मन की शांति भी गई इसलिए उसको भगवान में निष्ठा रखनी है । और निष्ठा में एक और महत्वपूर्ण चीज है उसमें हमें “बुद्धि “नहीं लगानी है । जैसे एक माँ है वो अपने बच्चे का ख्याल रखती है । तो वो बच्चा उसमें दिमाग नहीं लगाता कि माँ उसका कैसे ख्याल रखती है ।कि नहीं ? क्योंकि बुद्वि लगाने से तर्क-वितर्क हेांगे, शंका होती है । एक बच्चा कभी भी ये जानने की चेष्टा नहीं करता क्यों ? क्योंकि वो जानता है कि माँ वो व्यक्तित्व है जिसके पालन पोषण में कहीं कोई कमी नहीं है. वो उसको जानने का कभी प्रयत्न नहीं करता है ।

तो ईष्वर क्या है वो हमारी माँ है और हम उसके बच्चे है उसके काम में हमें अपनी बुद्धि नहीं लगानी है वो जो भी करता है वो हमारे भले के लिए ही करता है । हमें इतना विष्वास होना चाहिए कि कोई है जो हमारा ख्याल रख रहा है । जैसे हम दिल्ली की टेन में बैठे है और हमें पता है कि ये टेन दिल्ली जा रही है पर हम हर स्टेशन पर उतर कर ये पूछें कि ये ट्रेन दिल्ली जा रही है क्या तो ये तो बेवकूफी है हमें पता कि हम दिल्ली वाली ट्रेन में बैठे है । और ये दिल्ली ही जाएगी फिर भी पूछ रहे है ।आध्याम में बुद्धि का कोई काम नहीं है कि ये ऐसा क्यों ? आध्यात्म में भक्ति बढती है तो ज्ञान और वैराग्य अपने आप बढ़ता जाता है,हमें अपनी बुद्धि नहीं लगनी है.शंकाओ का समाधान अपने आप होता चला जाता है.कोई चाहे अगर कि हरि हो हम जान लेगे तो नहीं जान सकता.कौन उन्हें बारे में लिख सकता है.

प्रसंग – ३ महाराष्ट के एक बहुत प्रसिद्व संत थे नरसी मेहता जी उनकी भगवान में बहुत निष्ठा थी लोग उनकी भक्तिी से जलते थे वो तो भजन में डूब जाते थे तो दुनिया में हर तरह के लोग है । तो वो उनसे जलते थे । एक बार लोगों ने कहा - कि एक खंडहर था उसमें एक प्रेम आत्मा रहता था. सबको मालूम था कि यहाँ पर जाएगें तो वो भूत पकड लेगा. तो कोई नहीं जाता था ।

तो लोगों ने कहा-  कि नरसी मेहता को भेजते है । तो लोगों ने उनसे कहा - कि यहाँ पर एक एंकात जगह है आप वहाँ जाकर भगवान का नाम लीजिए. तो वो बहुत भोले थे उनको लगा कि ये लोग बहुत अच्छे है । मेरे लिए इतना सोच रहे है । तो वा सुबह उस खंडहर में जाकर बैठ गए. और राधे-कृष्ण, राधे कृष्ण, का नाम आँख बंद करके जपने लगे. और पता ही नहीं चला कि कब शाम हो गई । ते वो प्रेत उनके पास आया पर नरसी जी तो भगवान का नाम लेने में लगे थे. भूत ने सोचा कि ये कैसा हैसामने भूत खड़ा है और ये डर क्यों नहीं रहे.तो जब उन्हेंने आँख खोल कर देखा तो कहा-  कि आप मेरे बिहारी जी हो, और मुझे दर्षन देने के लिए भूत के रूप में आए हो. क्योकि भक्त है तो सच्चे भक्त को तो सभी जगह भगवान नजर आते है, तो भगवान उस भूत में प्रकट हो गए और बोले कि आपकी भक्तिी इतनी सच्ची है । कि मुझे इस भूत में से प्रकट होना पड़ा. आप मांगो आपकेा क्या चाहिए है । मै आपसे  बहुत खुष हूँ । तुम्हारी निष्ठा धन्य है ।


तो ये हमारे मन काम है इसमें बुद्वि नहीं लगानी है । हम अगर सही होगें तो वो नकारात्मक चीज भी सकारात्मक हो जाएगी, हमारे लिए तो हमें अपने मन को स्थिर रखना है । लोगों ने चाहा था कुछ और और हुआ कुछ और नरसी जी की निष्ठा के कारण भगवान भूत में से प्रकट हो गए तो हमें मन को शांत रखना है । क्योंकि जब तो वो शांत नहीं होगा वो परिपक्व नहीं होगा और एक परिपक्व मन जिस तरह का व्यवहार करता है  वो ही निष्ठा है । तो हमें शंका किसी चीज में नहीं करना है ।


आध्यात्म में जिसे चमत्कार कहते है वो ही निष्ठा है । भगवान राम क्यों शबरी को वन में ढूंढते हुए आ गए और भी ऋषि तो वन में तपस्या कर रहे थे । लोग कहते है कि भगवान दर्षन देने नहीं आते तो क्यों नहीं आएगें वो, पर हमारी निष्ठा तो वैसी हो कैसी? अटल, जो कभी टूटे ना, चाहे वो हमें सुख में रखें या दुख में शरणागति पूर्ण हो, जैसे एक मुजरिम है । तो वो जज के सामने सिलेंडर कर देता कि अब तो सबकुछ आपके हाथ में है तो ये शरणागति है । तो ऐसे ही हमें भगवान की शरण में जाना है उन्होनें जो भी हमारे लिए कर दिया बस वहीं है । भगवान जो भी हमारे लिए करेाग वहीं उत्तम है । यहीं निष्ठा है । और यहीं अंतर है विष्वास में और निष्ठा में विष्वास हम बार-बार तोडते है । जरा ही किसी ने कहा और हमारा विष्वास टूट गया. तो हमें अटल निष्ठा रखनी है ।

तभी हम आध्यात्म में जा पाएगें और शांति मिलेगी और ये सारी चीजें एकदम से नहीं आएगी अभ्यास से हर चीज होती है । हमें अपने मन को हर मिनिट देखना कि वो कहाँ है । क्या कर रहा है । जैसे एक माँ है वो काम करती है किसी आफिस में तो उसका बच्चा घर में अकेला रहता है । और वो दिन भर उधम करता है सामान फैलाता है और जब उसकी माँ शाम को घर आती है । तो वो पूरा घर बिखरा देखकर गुस्सा होती है । तो वो अगर जब आफिस जाती है । और वहाँ जाकर अपने बच्चे को हर आधें घंटे में फोन करके पूछें कि तुम क्या कर रहे हो ?तुमने घर का काम किया की नहीं? तो वो बच्चा बिगडेगा नहीं और माँ के डर से पूरे घर का काम करेगा.

ऐसे ही हमारे मन के साथ है जब हम रात में अपने मन को देखगें कि दिन भर में तो हमनें कई चीजें सोच ली है । हमारा मन ना जाने कहाँ कहाँ हो आया है । हमें हर मिनिट में मन को देखना है कि ये गलत जगह गया तो क्यों गया? धीरे धीरे करके कंन्टरोल में आ जाएगा फिर  हम उस बच्चे की तरह उसे जो कहेंगे वो वहीं करेगा । तो डर बनाना जरूरी है हमें वहाँ नहीं जाना तो नहीं जाना तो मन जब शांत होगा तो हम उसके इषारे में नहीं बल्कि मन हमारे इषारे पर चलेगा तो भक्तिी में ये एक सकारात्मक बिंदू है वो है निष्ठा विष्वास से बढकर है । हमें विष्वास पर आकर नहीं रूकना है । उससे आगें की ये सीढी है निष्ठा तो हमें अपने अंदर निष्ठा लानी है

 

“राधे-राधे”

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